Monday, February 6, 2012

ख़ुशी......

                                                                                       
हर दिन की तरह,  तुम उस दिन भी सुबह की किरणों के साथ आयी...

तुम मुझसे मिलने आई,

कुछ बाते करने आई ...

पर मैने तुमसे मुंह मोड़ लिया ....



उस दिन मैं शाम मे बैठा - बैठा यही सोच रहा था ..

कि तुम्हारी  ज़रुरत नहीं है मुझे,

तो फिर तुम क्यों बार- बार चली आती हो मेरे पास

जब की तुम्हे पता है कि,  मुझे है किसी और का इंतज़ार.... 



प्राथना मे भी मैने तुम्हे कभी नहीं मांगा

फिर भी पता नहीं क्यूँ इश्वर भेज देता है तुम्हे मेरे पास...

कितनी बार बोला है इश्वर से मैने ...

मुझे तुम्हारी नहीं किसी और की है आस ...



पर मै नादान उनका इशारा भी नहीं समझ सका

तुम थी वोह एक छोटी सी खुशी..

जो देना चाहती थी हमेशा मेरा साथ ..

ताकि मै अपनी उस बड़ी ख़ुशी कि तरफ बढ़ सकू



पर मैने तुमसे ही मुंह मोड़ लिया  .....

एक बार नहीं बार- बार ,कितनी बार मुंह मोड़

अब तो मै हर रोज़ सुबह कि किरणों के साथ देखता हूँ तुम्हारी राह..

मुझे कर दो माफ़ तुम और आजाओ लोट  कर मेरे पास .............

 

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